प्रयागराज-सा संगम मन

कहीं अनकही,
कहीं सिसकती,
अव्यक्त, अभिव्यक्त सी धड़कनें,
अपरिभाषित से एहसासों की,
दबी हुई उन बातों की लहरें
सब बहती हैं इस दिल में,
उद्गम है ये, संगम है ये,
इसीलिए तो प्रयाग है ये।

कुछ इश्क़ अभी-अभी लगे हुआ,
मन कुंभ सा मौन में भीग गया,
तप में, जल में, स्पर्श हवा में
तेरे होने का स्वाद घुल गया।

प्रयागराज सा मन मचल रहा,
इंद्रियों में जैसे शंख बज रहा,
चल आओ न, इस धार में अब,
जहाँ प्रेम, भक्ति संग मिल रहा।

सवितासिंह मीरा, प्रसिद्ध कवयित्री, जमशेदपुर

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