
अरूणा रावत, प्रसिद्ध लेखिका, बंगलौर
मैं हूँ एक उम्र-दराज़… तुम मुझे मुख़्तसर लिखना।
हूँ अदना-सा किरदार औरत के विस्तार का,
तुम मुझे सिलसिलेवार लिखना।
लिखना मेरे होने के वजूद को,
अपनी नहीं… मेरी नज़रों से लिखना।
जो न देख सकी कभी दुनिया,
मेरी वो तस्वीर तुम लिखना।
माशरे ने तौला है अपने ही पैमानों पर मुझको…
तुम… मुझे माँ, पत्नी, बहन नहीं
एक औरत… कम-से-कम एक इंसान तो लिखना।
मैं जानती हूँ, है वो सलाहियत तुम में
मुझे समझने की…
लिखोगे मुझको बेहतर इसलिए नहीं कि चाहती हूँ कोई जाने मुझको,
लिखना क्योंकि तुम चाहते हो मुझे लिखना।
बहुत ख़ूब 👌👌