
मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)
इस बार हमने तय किया कि बच्चों की परीक्षा के बाद हम कश्मीर घूमने जाएंगे। मैं इस यात्रा को लेकर बहुत उत्साहित थी। लेकिन यात्रा के एक हफ्ते पहले ही मेरे पति को ऑफिस का कुछ ज़रूरी काम आ गया और वह कश्मीर का प्रोग्राम रद्द करने के बजाय मुझे और बच्चों को कश्मीर भेजना चाह रहे थे। अंतिम निर्णय के बाद हम 25 मार्च 2018 को मुंबई से श्रीनगर की हवाई यात्रा के लिए निकल पड़े।
मन में अनेक शंकाएँ उभर रही थीं। अपने दो बेटों 13 वर्ष और 10 वर्ष के साथ मेरी यह यात्रा, अपने पति के न आ पाने पर भी स्थगित न करना, मेरा अपना फैसला था, क्योंकि मुझे मालूम था कि अगर एक बार कश्मीर का कार्यक्रम रद्द हुआ तो ज़िंदगी में शायद ही कभी कश्मीर देखने का मौका मिले। फैसला मुश्किल था क्योंकि एक महीने पहले ही पुलवामा की घटना के चलते कश्मीर का माहौल कुछ ठीक नहीं था। ऐसे में दो बच्चों के साथ वहाँ जाकर घूमना-फिरना रोमांचक होने के बजाय मुझे भयभीत कर रहा था।
कश्मीर, वहाँ के लोग सभी को लेकर मन में अनेक सवाल थे। खैर, श्रीनगर पहुँचकर जब ट्रैवल एजेंट (इफ़रा, जो आज भी मेरी दोस्त है) का ड्राइवर हमें हमारे होटल तक पहुँचा कर चला गया और बोला-“मैडम, आप शाम 6-7 बजे के बाद बाहर मत निकलिएगा।” सबसे पहले तो मैंने बच्चों के साथ मिलकर पूरे कमरे की अच्छे से तलाशी ली, फिर जाकर राहत की साँस ली। मैं बहुत डरी हुई थी कि आगे के पाँच दिनों में क्या होगा, कैसे होगा। दोनों बच्चों को भी मैंने बहुत सारी बातें समझाई थीं — हमें अनजान लोगों से बात नहीं करनी है, किसी के हाथ से खाने का कोई सामान नहीं लेना है, और हरदम चौकन्ना रहना है।
अगले दिन श्रीनगर से हम रवाना हुए गुलमर्ग के लिए। धीरे-धीरे मैं आश्वस्त होने लगी। चारों तरफ सफेद बर्फ़ की चादर बिछी थी और सुंदर नज़ारे मन को मोह रहे थे। वहाँ के लोगों का व्यवहार बहुत ही अच्छा था। वहाँ के लोगों का रोजगार मुख्यतः पर्यटन पर ही निर्भर करता है, इसलिए शायद वे पर्यटकों को किसी भी तरह की असुविधा न हो, इसकी पूरी कोशिश करते हैं। उनका बात करने का लहजा बहुत सम्मानजनक था। अपने मेहमानों की आवभगत में वे कोई कमी नहीं रखते थे।
गुलमर्ग से पहलगाम और फिर सोनमर्ग का सफर बहुत ही अच्छा था। वहाँ पहुँचकर ही समझ आता है कि कश्मीर को ‘धरती का स्वर्ग’ क्यों कहा जाता है। डल झील पर शिकारा लेकर घूमना और वहीं शिकारे में ही सामान बेचते लोग, सुंदर फूल, उनके बीज, वहाँ की पोशाकें, सूखे मेवे सब कुछ आप शिकारे की सवारी करते-करते ही खरीद सकते हैं। शिकारे पर बने हाउसबोट में रहना भी एक अलग ही अनुभव था। किंतु सीज़न न होने या कश्मीर का माहौल सही न होने के कारण शिकारे में बहुत से लोग नहीं थे। शिकारे में सिर्फ़ मैं और मेरे बच्चे अकेले ही थे।
मन में बहुत डर था। मैंने अपनी ट्रैवल एजेंट इफ़रा को कहा भी कि मैं शिकारे पर रहना नहीं चाहती, आप गाड़ी भेजकर मुझे होटल में शिफ्ट करवा दीजिए। तब उसने मुझे आश्वस्त किया — “आप हमारी मेहमान हैं, आप हमें जान से भी ज़्यादा प्यारी हैं, हम आपको खरोंच तक नहीं आने देंगे। आप वहाँ आराम से रहिए।” उसकी बातों से मैं कुछ आश्वस्त हुई। उसके बाद हाउसबोट के केयरटेकर, जो एक बुज़ुर्ग थे, उनसे बातचीत और उनके व्यवहार से मेरा बचा-खुचा डर भी निकल गया।
पूरी हाउसबोट पर लकड़ी की नक्काशी वाला फर्नीचर बहुत सुंदर था। उन्होंने हमारी पसंद का खाना बहुत प्यार और सादगी से बनाया और खिलाया। मैं और बच्चे देर रात तक डायनिंग रूम में रज़ाई में घुसकर टेलीविज़न देखते रहे और हीटर की गर्मी से सर्दी को भगाने की कोशिश करते रहे।
हाउसबोट के केयरटेकर और शिकारे के सभी लोग मुझे बच्चों के साथ अकेले देखकर एक प्रश्न उनकी आँखों में उभरता दिख रहा था कि मैं यहाँ इतनी सुंदर जगह पर बच्चों के साथ अकेली क्यों हूँ। उनमें से किसी के पूछने पर मैंने बताया कि मेरे पति मुंबई में रहते हैं और किसी मजबूरीवश मेरे साथ नहीं आ पाए।
दरअसल, मैंने सुहाग की कोई निशानी नहीं पहनी थी. यह बात मुझे बहुत देर से समझ आई। हाउसबोट के ‘चाचा’ तो मेरी बातों से भी नहीं मान रहे थे (ऐसा उनके भावों से लगा)। तब मैंने वीडियो कॉल पर उनकी मेरे पति से बात कराई, तब जाकर वे विश्वास कर पाए और बहुत खुश हुए।
अगले दिन सुबह हमें मुंबई के लिए रवाना होना था। अत्यधिक ठंड की वजह से मेरी तबीयत थोड़ी ख़राब हो गई थी और आवाज़ नहीं निकल रही थी, लेकिन कश्मीर से वापस आने का मन ही नहीं कर रहा था। कायनात की खूबसूरती मनभावन थी।
अगर हम कश्मीर में तनाव की बात करें, तो वह सिर्फ़ कुछ हिस्सों में रहता है. ख़ासकर दक्षिणी कश्मीर में। लेकिन बाकी जगह शांति व्याप्त है। हमारी भारतीय सेना सभी जगह मौजूद है। पर्यटकों की सुरक्षा का पूरा-पूरा बंदोबस्त है।
मैं और मेरे बच्चे, जो डरते-डरते कश्मीर गए थे, आज दिल में सुनहरी यादें और आँखों में तस्वीरें बसाए, वापस अपने घर — अपने शहर की ओर लौट रहे थे।
Totally agree with you.वाकई कश्मीर को धरती का स्वर्ग क्यों कहा जाता है यह सिर्फ वहां जाकर ही समझा जा सकता है।
Realistic description of kashmir
Dharti ka swarag
बहुत ही सरलता से आपने सब कह दिया है..!!