दो चेहरे

शैफाली सिन्हा, नवी मुंबई (महाराष्ट्र)

मैं अक्सर ऐसे चेहरे देखती हूँ,
जो दो चरित्र जीते हैं
एक वो, जो सच में होते हैं,
दूसरे वो, जो दुनिया को दिखते हैं।

आज किसी और की खुशी
किसी और का दर्द बन जाती है,
और दूसरों की तरक्की
जलन की आग भड़का जाती है।

झूठी बातें, झूठे वादे,
झूठी शान-ओ-शौकत का शोर,
और इन्हीं के बीच
बचपन हर रोज़ सीख रहा है।

वक़्त रहते अगर हम न संभले,
तो आने वाली पीढ़ी को
सच नहीं
सिर्फ़ दिखावे की दुनिया मिलेगी।

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