
चंद्रवती दीक्षित, प्रसिद्ध लेखिका, करनाल (हरियाणा)
परिवार प्रथम पाठशाला,
विद्यालय बनाए पहचान।
संस्कारों संग आगे बढ़ें तो,
जीत लें सकल जहान।”
जी हाँ, यह कटु सत्य है। हम इन मूल्यों पर चलते नहीं, तभी हमें सब दिखावा लगता है। लेकिन जब इनका वास्तविक अहसास होता है, तो मन को गहरा सुकून मिलता है।
अभी दोपहर के भोजन का समय था कि रवनीत बिटिया, बाल वाटिका की छात्रा, दौड़ते हुए अध्यापिका के पास आई। बड़े प्रेम से एक जोड़ी जूते दिखाते हुए बोली-“गुरुजी! ये जूते हम अपनी कक्षा की छात्रा खुशी के लिए लाए हैं। ये जोड़ी मेरे दादीजी मेरे लिए लाए थे। हमने पिताजी को भी कहा था कि वे हमारे जूते ले आएँ, क्योंकि पाठशाला में प्राचार्य जी रोज़ वर्दी जाँच करते हैं, इसलिए वे पहले ही ले आए। दादाजी को यह बात पता नहीं थी। वे जब गौशाला में गायों को चारा देने गए, तो लौटते समय वे भी हमारे लिए जूते ले आए। अब हम दो जोड़ी जूतों का क्या करेंगे? हाँ, दादाजी वाली जोड़ी एक नंबर बड़ी है। माँ ने कहा कि कुछ दिनों बाद ठीक आने लगेगी।
परंतु जब मैंने इतनी ठंड में खुशी को नंगे पाँव देखा, तो हमारा दिल भर आया। उसके घर की आर्थिक तंगी के कारण उसके जूते नहीं आ सके थे। इसलिए हम ये जूते खुशी को देना चाहते हैं।”
इतना मार्मिक और आत्मीयता से भरा रवनीत का भाव देखकर अध्यापिका का दिल पिघल गया। उन्होंने तुरंत खुशी बिटिया को पास बुलाया और सच्ची सहपाठी रवनीत के पावन कर-कमलों से जूतों की जोड़ी उसे भेंट करवाई।
सर्दी के मौसम में विद्यालय की वर्दी के जूते पाकर खुशी के उत्साह का ठिकाना न रहा। वह अत्यंत आत्मीय भाव से रवनीत को धन्यवाद देते हुए बोली-
“तुम्हारा मन कितना पावन,
उपहार दिया मुझे मनभावन।
मिल-जुलकर करेंगे काम,
देश का ऊँचा होगा नाम।”
संस्कारों की यह पावन डोर पूरे परिवेश को गौरवान्वित कर रही थी। अध्यापिका भी संतुष्ट मन से माँ शारदे का आभार प्रकट कर रही थीं कि उनके द्वारा दी गई शिक्षा सही दिशा में अग्रसर है। हर्ष के ये अविस्मरणीय पल मध्याह्न भोजन की मिठास में घुलकर जीवन को एक नए आयाम की ओर प्रेरित कर गए।
दिल से दिल तक