जीवन जंग नहीं, काँटों से
फूलों का भी यहाँ बसेरा है,
कटुता ही सिर्फ नहीं इसमें,
मधुरता का भी यहाँ डेरा है।
क्यों बैठे हो उदास होकर ?
यहाँ उमंगों का भी घेरा है,
क्यों भाग रहे हो, तपोवन से?
यह उपवन भी तेरा है,
जीवन जंग नहीं, काँटों से
फूलों का भी यहाँ बसेरा है।
विचलित हो जाओगे, यदि बीच राह में,
लक्ष्य कैसे भेद, पाओगे?
पराजय से घबरा जाने पर,
विजयी कैसे कहलाओगे?
अंधकार से, यदि डर जाओगे,
रौशनी तक कैसे पहुँच पाओगे?
हताश हो जाओगे दूरी से यदि,
मंजिल कैसे पास लाओगे?
जीवन जंग नहीं, काँटों से
फूलों का भी यहाँ बसेरा है।
हारोगे यदि, हिम्मत अपनी,
जीत को कैसे पाओगे?
भयभीत होगे, यदि तूफानों से,
उड़ान कैसे भर पाओगे?
जीवन जंग नहीं, काँटों से
फूलों का भी यहाँ बसेरा है।
उठो.. साकार करो ख़ुद को,
यह जीवन सिर्फ तेरा है,
बेकार करो न इसे रुककर
यह अमूल्य समय धन भी तेरा है,
जीवन जंग नहीं, सिर्फ काँटों से
फूलों का भी यहाँ बसेरा है।

मीनू वर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, नोएडा(उत्तरप्रदेश)
अच्छी कविता
छोटी-बड़ी रुकावटों से हारना नहीं चाहिए जिससे आने वाली जीत की खुशी मना सके ।
बहुत सुंदर और आशावान सन्देश