रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर
आज शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो, जब अख़बार या न्यूज़ चैनलों पर बलात्कार की कोई ख़बर न दिखाई दे. दोतीन वर्ष की मासूम बच्ची से लेकर साठ सत्तर वर्ष की वृद्ध महिला तक कोई भी उम्र इस अपराध से सुरक्षित नहीं रह गई है. एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि भारत में प्रतिदिन औसतन लगभग 87 बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं, और यह संख्या वास्तविकता से कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि सामाजिक बदनामी और शर्म के डर से अनेक पीड़िताएं चुप रह जाती हैं. बस भयावह तथ्य यह है कि लगभग 44% मामलों में अपराधी पीड़िता के परिचित या रिश्तेदार ही होते हैं. कहीं पिता, कहीं भाई, कहीं मामा, कहीं शिक्षक या संरक्षक घर और भरोसे की दीवारें ही सबसे पहले टूटती हैं.
अक्सर इस अपराध के लिए लड़कियों के कपड़ों, उनके बाहर निकलने या उनकी जीवनशैली को दोषी ठहराया जाता है. कहा जाता है कि छोटे कपड़े पहनने से ग्रीन सिग्नल मिल जाता है. लेकिन सवाल यह है दो या तीन साल की बच्ची कौन-सा ग्रीन सिग्नल देती है? साठ साल की बुज़ुर्ग महिला कौन-सी उत्तेजना पैदा करती है? और उन छोटे लड़कों का क्या, जो स्कूलों, हॉस्टलों और घरों में यौन शोषण का शिकार होते हैं?
यदि बलात्कार केवल स्तन, योनि और लिंग का खेल होता, तो बच्चों और पुरुषों के साथ होने वाले यौन अपराधों की व्याख्या कैसे की जाए? यह स्पष्ट है कि यह अपराध शरीर से नहीं, बीमार मानसिकता से जन्म लेता है. दिल्ली के निर्भया कांड ने पूरे देश को झकझोर दिया था. बलात्कार के बाद की गई अमानवीय हिंसा , लोहे की सरिया, बोतलें, काँच, पत्थर, जलाना, मारना, नग्न अवस्था में छोड़ देना ..यह सब यह सिद्ध करता है कि यह केवल वासना नहीं, बल्कि क्रूर सत्ता और नियंत्रण की मानसिकता है. ऐसे अपराधी बसों, ट्रेनों, भीड़भाड़ वाली जगहों पर महिलाओं को छूने के बहाने ढूँढते हैं.
सुनसान सड़कों पर अपने निजी अंग दिखाना, रास्ता रोककर अश्लील प्रस्ताव देना, विरोध करने पर मार देनायह सब उसी विकृत सोच का विस्तार है. कई बार मर्दानगी साबित करने के नाम पर रिश्तों में जबरन यौन संबंध बनाए जाते हैं. शराब के नशे में पत्नी को रोज़ शारीरिक संबंध के लिए मजबूर करना भी इसी मानसिक हिंसा का हिस्सा है.
यह मानसिकता इतनी विकृत है कि ऐसे लोग जानवरों तक को नहीं छोड़ते. एक तस्वीर, एक कल्पना भी उन्हें उत्तेजित करने के लिए पर्याप्त होती है. भारत में आज माता-पिता बेटी के जन्म पर इसलिए दुखी नहीं होते कि दहेज कैसे जुटाएँगे, बल्कि इसलिए भयभीत होते हैं कि उसकी सुरक्षा कैसे करेंगे. यह लेख किसी एक वर्ग, एक लिंग या एक समाज के विरुद्ध नहीं है.यह उस सोच के विरुद्ध है, जो इंसान को वस्तु समझती है.जब तक हम अपराध को कपड़ों, समय, जगह या पीड़िता के व्यवहार से जोड़ते रहेंगे, तब तक अपराधी बेखौफ रहेंगे.
समाधान केवल क़ानून में नहीं,संस्कार, शिक्षा, संवेदनशीलता और मानसिक स्वास्थ्य पर खुली बातचीत में है. क्योंकि समस्या शरीर नहीं सोच है.
बहुत बढ़िया प्रयास रक्षा जी । हम अक्सर इन मुद्दों पर बात करने से ही कतराते हैं, खुली चर्चा और खुली सोच रखकर ही समाज में होने वाले अन्याय को रोकने की दिशा में सार्थक प्रयास किये जा सकते हैं
सुंदर और सटीक