जड़ें और बेलें

शशिकला पटेल, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई

नीरा एक होनहार लड़की थी. आत्मनिर्भर, मेहनती और स्पष्ट सोच वाली। छोटे शहर की गलियों से निकलकर उसने महानगर की चकाचौंध में अपनी जगह बनाई थी। उसके भीतर कुछ कर गुजरने का जुनून था, और इसी जुनून ने उसे शहर के एक नामी संगठन तक पहुँचा दिया।

कार्यस्थल पर उसके काम की चर्चा होने लगी थी। वह योजनाएँ बनाती, समस्याओं के समाधान खोजती और अपनी टीम में सकारात्मक ऊर्जा भर देती। लेकिन सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसने महसूस किया कि उसके इर्द-गिर्द कुछ ऐसे चेहरे भी हैं, जो उसके कंधे पर चढ़कर ऊपर जाना चाहते हैं।

वे मुस्कुराते थे, तारीफ़ें करते थे और फिर चुपचाप उसकी मेहनत का श्रेय खुद ले लेते थे। सलाह देते-“नीरा, टीमवर्क में अपना नाम मत ढूँढो।”“तुम्हारे विचार बहुत काम आते हैं,” और उन्हीं विचारों को मीटिंग में अपने नाम से पेश कर देते। नीरा भ्रमित होने लगी थी, क्या यही सहयोग है? यह दोस्ती है या उपयोग? वह यह सब सहती रही, झेलती रही… लेकिन भीतर कुछ था, जो धीरे-धीरे सूखता जा रहा था।

एक रविवार वह थककर अपने बचपन के गाँव लौट आई। वर्षों बाद वह अपने आँगन में उस आम के पेड़ के नीचे बैठी, जहाँ उसने बचपन की सबसे मासूम यादें संजोई थीं। लेकिन आज वह पेड़ भी कुछ बुझा-बुझा सा लगा।

नीरा ने गौर किया उसकी शाखाओं पर पीली बेलें लिपटी हुई थीं अमरबेलें।

उसने दादी से पूछा, “दादी, ये पीली-पीली लताएँ क्या हैं?”

दादी बोलीं,“बिटिया, इसे अमरबेल कहते हैं। ना इसकी कोई जड़ होती है,ना ज़मीन से कोई रिश्ता।यह बस किसी पेड़ से चिपक जाती है और धीरे-धीरे उसका रस चूसकर उसे भीतर से खोखला कर देती है।”

नीरा चौंक गई।

उसे अपने ऑफिस के लोग याद आ गए-वे चेहरे, वे मीठी बातें और उसका धीरे-धीरे कमज़ोर होता आत्मबल।

उस दिन उसे समझ आ गया- जिनकी खुद की कोई जड़ नहीं होती, वे दूसरों की जड़ों पर बेल की तरह चढ़ते हैं।लेकिन वे कभी पेड़ नहीं बन सकते।वह गाँव से लौटी, लेकिन इस बार बदली हुई। उसने अमरबेलों को पहचान लिया था।अब वह सिर्फ काम नहीं करती थी,बल्कि अपनी सीमाएँ भी तय करती थी। अपने विचारों पर अधिकार रखती,और अपनी ऊर्जा चूसने वालों से दूरी बनाती।

धीरे-धीरे वह फिर से मज़बूत होने लगी ठीक उस पेड़ की तरह,जिसने अमरबेलों को गिरा दिया हो और अब फिर से हरियाली की ओर बढ़ रहा हो।

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