गुरु की छाया में गढ़ता जीवन

कच्ची मिट्टी चाक पर
गढ़ता जाये कुम्हार
घिस घिस कर फिर देता है
उसे एक नया आकार

कोमल मन और अबोध सा बचपन
मात पिता के संग
बोलना चलना हाथ पकड कर
सीखा उनके संग
शिक्षा के मन मंदिर मे जब
रखा पहला कदम
पहली बार वो हाथ छुड़ाकर मात पिता का
सहमा था अबोध बचपन

प्यार दुलार से पुचकारा जिसने
शिक्षक वो कहलाया
जिसके साये मे उस अबोध ने
खुद को महफूज था पाया

नया जीवन नयी चुनौती
एक नया आयाम रचा
कामयाबी की ओर हर दिन
फिर एक नया कदम उठा

एक एक कदम कामयाबी की ओर
सफलता का एक नया इतिहास रचा
गढा जिसने उसे वो उसका
शिक्षक महान कहलाया

अमिट छाप छोड़ी उस अबोध बालमन पर
जीवन भर उसके कर्ज का मोल
कभी नही फिर वो चुका पाया।
कितने भी वो उच्च शिखर पर चढा
पर शिक्षक के चरणों मे हर पल शीश झुकाया ।

संध्या श्रीवास्तव, प्रसिद्ध लेखिका लखनऊ

One thought on “गुरु की छाया में गढ़ता जीवन

  1. माता – पिता की उंगली के बाद बच्चा सिर्फ अपने शिक्षक पर ही विश्वास करता है और उसकी उंगली पकड़कर शिक्षा पूरी करता है ।
    अपनी समस्याओं के समाधान में उसकी सम्मति लेता है , प्यार और सही दिशा भी वहीं पाता है ।
    धन्य है यह शर्तहीन रिश्ता ।

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