कच्ची माटी को आकार देती हूँ
रूको न तुम तुम्हें रफ़्तार देती हूँ,
मैं शिक्षक हूँ,सृजन ही काम है मेरा
विचारों को तुम्हारे मैं नई धार देती हूँ……
जनम देते माता पिता तुमको
चरित्र को मैं ही आधार देती हूँ,
तुम सींचोगे भारत की बगिया को
मैं मूल्यों का तुमको उपहार देती हूँ….
बढ़ते तुम प्रगति पथ पर तो
मैं निर्देशों से तुम्हें हुन्कार देती हूँ
सफल तुम हो तो जय मेरी भी है होती
मैं अपने प्रयासों से तुम्हें नवाकर देती हूँ …

अंजू सुंदर,असिस्टेंट प्रोफेसर, लखनऊ
धन्यवाद संपादक जी