
मधु झुनझुनवाला ‘अमृता‘ प्रसिद्ध साहित्यकार, जयपुर (राजस्थान)
मुंतज़िर थे हमीं न कल होंगे ।
ये लम्हे क्या कभी अज़ल होंगे ।
फ़िक्र अब है कहाँ मुहब्बत में,
ज़ीस्त में क्यों सनम दख़ल होंगे ।
दिल बुझेंगे कभी जो फुर्कत में,
ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे ।
बाद मेरे इन्हीं निगाहों में ,
अश्क़ में तर हसीं कँवल होंगे ।
रूह में हो बसर तुम्हीं तुम हो
आख़िरी मधु यकीन पल होंगे ।
आत्मिक आभार सुरेश जी 🙏🏻