
मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)
सांवले से कुछ गहरा रंग, बड़ी-बड़ी हिरणी सी आंखें , मध्यम कद । ऐसा था चित्रा का रूप रंग का चित्र ।
बचपन से ही मेधावी छात्रा थी, वह किताबों के सहारे एक उज्जवल भविष्य बुनना चाहती थी। हालाँकि, उसके सपनों और हकीकत के बीच पारिवारिक तंगी की एक मोटी दीवार खड़ी थी। अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए, उसने छोटी उम्र में ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया।
परन्तु, नियति को कुछ और ही मंजूर था। अचानक पिता की मृत्यु ने परिवार की नींव हिला दी। भाई ने मजबूरी में घर की जिम्मेदारी संभाल ली, जिसके कंधों पर अब दो बहनों के विवाह का बोझ भी आ गया। माँ सीधी-सादी, अनपढ़ महिला थीं, जो अपनी बेटी को समझने में असमर्थ थीं। जिस समय चित्रा आकाश में उड़ना चाहती थी,
उसे विवाह के पिंजरे में, कैद होना पड़ा।
पारिवारिक दबाव और भाई की चिंता के चलते, चित्रा के लिए एक अप्रिय विवाह संबंध तय कर दिया गया। वर, चित्रा से उम्र में काफी बड़ा था और उसकी आँखों की रोशनी भी बहुत कम थी। चित्रा ने विरोध करने का कोई रास्ता नहीं देखा। पिता नहीं थे, और माँ से बात करना व्यर्थ था, जो उसकी मानसिक उथल-पुथल को समझ ही नहीं पाती थीं।
शादी हुई और चित्रा अपने नए घर चली गई। उसने चुपचाप खुद को उस परिवार में रचा-बसा लिया। खुशी और उल्लास की जगह, जीवन एक शांत समझौते की तरह गुजरने लगा। समय बीता और चित्रा ने दो बेटों को जन्म दिया, जो उसकी सूनी दुनिया के एकमात्र उजाले थे।
जैसे-जैसे बच्चे बड़े हुए और खर्च बढ़ा, चित्रा ने फिर से ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। वह अपने बच्चों की जिम्मेदारियाँ स्वयं उठाने लगी। उसका संसार सिमटकर रह गया था—बस उसका घर, उसके बच्चे, और उनकी पढ़ाई। बाहरी दुनिया से उसका कोई वास्ता नहीं रहा, न ज़्यादा कहीं आना-जाना, न किसी से मिलना-जुलना।
किस्मत शायद इस ठहराव को तोड़ना चाहती थी। एक पारिवारिक समारोह में चित्रा की मुलाकात पंकज से हुई, जो उसकी चचेरी बहन का देवर था। शादी से पहले भी वे मिल चुके थे, पर उस समय दोनों की दुनियाएँ अलग थीं। पंकज उम्र में चित्रा से पाँच साल छोटा था।
इस बार, यह मुलाकात एक सिलसिले की पहली कड़ी बन गई। फ़ोन पर बातचीत शुरू हुई, फिर सोशल मीडिया पर दोस्ती हुई, और जल्द ही दोनों के बीच एक नया, अनचाहा रिश्ता पनपने लगा। पंकज की अपनी पत्नी थी, जो सुंदर , सुघड़ और पढ़ी लिखी औरत थी, और एक बच्चा भी था। पंकज ने प्रेम विवाह किया था । उसकी जिंदगी में कोई कमी नहीं थी, फिर भी उसका स्वभाव खुला और लापरवाह था।
चित्रा को पंकज से बात करके ऐसा महसूस हुआ जैसे वह वर्षों की चुप्पी के बाद फिर से जीवित हो उठी हो। उसका पति, जो शायद आँखों और मन दोनों से ही कमज़ोर था, कभी उसकी सुंदरता को नहीं पहचान पाया। जब पंकज उसकी सुंदर, बड़ी-बड़ी आँखों की तारीफ करता, तो चित्रा की आत्मा तृप्त हो जाती। यह अनुभव उसके लिए एक नया और मादक एहसास था। पंकज ही उसके लिए जीने का एकमात्र सहारा बन गया। ऐसा नहीं था कि चित्रा समझ नहीं रही थी । पर अब शायद वह समझना नहीं चाहती थी।
चित्रा ने अपनी जीवन की सारी निराशा पंकज को बताई। पंकज ने उसे कुछ अस्पष्ट आश्वासन दिए, और चित्रा ने मान लिया कि वह उसे इस ‘दलदल’ से निकालकर एक बेहतर जीवन देगा। उसने अपनी सोचने-समझने की शक्ति को त्यागकर, अपनी बुद्धि को एक भारी पत्थर से दबा दिया। उसने यह सोचने की जहमत नहीं उठाई कि उसके दो बच्चों का क्या होगा, या क्या पंकज सचमुच अपनी सुखी-सम्पन्न दुनिया को उसके लिए छोड़ देगा?
दरअसल, पंकज के लिए चित्रा उसके ठहरे हुए जीवन में केवल एक रोमांचक हलचल थी—एक अस्थायी आकर्षण।
और फिर एक दिन वही हुआ, जो अक्सर ऐसे रिश्तों का अंत होता है। पति को शक हुआ। उसने चित्रा को फ़ोन पर बात करते हुए सुना, कॉल रिकॉर्ड्स निकाले, और मैसेज पढ़े। अब चित्रा का जीवन एक मानसिक और शारीरिक नर्क बन गया।
कुछ दिनों तक यह सब झेलने के बाद, चित्रा टूट गई और उसने अपने परिवार वालों से गुहार लगाई कि वह अब इस ‘नर्क’ में नहीं रह सकती। दूसरी तरफ उसके पति और ससुराल वालों ने मायके वालों से शिकायत की आपकी बेटी चरित्रहीन हैं अब यह और यहां नहीं रह सकती । मगर एक मध्यमवर्गीय परिवार में, तलाक़शुदा बेटी और उसके दो बच्चों की जिम्मेदारी कौन उठाता? भाई अपनी गृहस्थी में व्यस्त था।जब चित्रा ने पंकज से बात करने की कोशिश की, तो उसने निर्ममता से हाथ झटक दिए। “तुम मेरे लिए सिर्फ एक दोस्त थी,” उसने कहा। “मैंने कभी तुम्हें जीवनसाथी के रूप में नहीं देखा, और न ही कोई ऐसा वादा किया था। तुमने जो भी सोचा, वह तुम्हारी अपनी भावनाएँ थीं।”
इधर, दोनों परिवारों के लोगों ने मिलकर चित्रा को बहुत खरी-खोटी सुनाई, उसके व्यवहार के लिए शर्मिंदगी जताई, चित्र की मर्जी किसी ने जाननी नहीं चाही । समझौते के तहत चित्रा के पति ने उसको घर निकाला नहीं दिया। ( देता भी कैसे ? घर चित्रा के भरोसे ही चल रहा था )
चित्रा को उसी दयनीय हालत में छोड़ कर सब अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए। चित्रा रोई, गिड़गिड़ाई, लेकिन कोई उसकी मदद को आगे नहीं आया। उसे लगा, “क्या मेरी जिंदगी में इससे भी बुरा कुछ होने के लिए बाकी है?” चित्रा अपने बच्चों के सामने शर्मिंदा थी। बच्चे बड़े हो रहे थे, और अपनी माँ की पूरी स्थिति को देख और समझ रहे थे। वे कुछ करना चाहते थे, पर कैसे, यह उन्हें नहीं पता था।
चित्रा ने सोचा ऐसे जीवन से तो मर जाना बेहतर है, लेकिन अपने बच्चों के बारे में सोचकर जीवन को अपना लिया।
चित्रा की हालत बद से बदतर हो गई। पति को अब उसे अपमानित करने और पीटने का जैसे लाइसेंस मिल गया था। अपनी आँखों की रोशनी कम होने का दोष भी वह चित्रा पर ही मढ़ता था। चित्रा अब अपने ‘जुर्म’ की सजा भुगत रही थी।
वह अपने ही घर में नज़रबंद थी। इतने बड़े परिवार में उसे कहीं भी आने-जाने की इजाजत नहीं थी। वह सिर्फ माँ की मृत्यु पर और एक बार चाची की मृत्यु पर मायके जा पाई थी। अगर वह पास के बाज़ार भी जाती, तो ननद या सास साथ जाती थीं।
भगवान राम का वनवास भी चौदह वर्ष में पूरा हो गया था, पर चित्रा का यह आजीवन कारावास शायद यूँ ही चलता रहेगा, एक ख़ामोश और अंतहीन सज़ा के रूप में। बात पंकज की भाभी के जरिए उसके परिवार में भी पहुंची।
लेकिन पंकज ने कभी आवाज ऊंची करके और कभी डिप्लोमैटिकली , अपने ऊपर आते हुए सभी इल्ज़ामों को ठुकरा दिया ।
पत्नी की थोड़ी बहुत नाराजगी को झेल कर उसका जीवन फिर सामान्य गति से चल पड़ा।
हमेशा की तरह एक नए सब्जेक्ट पर नई कहानी के लिए दिल से धन्यवाद मधुजी
आज के समाज का बहुत ही चिंताजनक, खोफनाक सच हे यह।बहुत सी महिलाएं अपनी शादीशुदा जिंदगी में खुश न होने की वजह से इस तरह के भेड़ियोकी शिकार हो जाती है।अपनी जिंदगी और बद्तर कर लेती हे।
भावनात्मक रचना
Emotional
वर्तमान परिवेश की कहानी बहुत पसंद आती। मधु जी को बहुत-बहुत बधाई।
Acchi kahani hai aksar logo ke jeevan me es tahara ki ghatna hoti bhi hai. Lakin mere vichar se kahani ka jo title hai uska arth sahi mayne main ubhar ke nahi aaya. Lekhika ka pryas sarharniye hai.