कुछ तो कहो…

मैं शब्द चुनूँ,

तुम मौन रहो 

भली लगे न रीत,

कुछ तो कह दो,

कुछ तो गह लो,

हाय! जता दो प्रीत।

मैं भी इठलाऊँ,

मैं भी इतराऊँ,

झूम-झूम के लजाऊँ!

गढ़ लो मुझ पर

सखे कुछ गीत।

रक्तिम आनन,

खनके कंगन,

पायल छन छन,

दृग में अंजन,

काया कंचन 

तब बनो प्रिये मीत।

मन हार चुकी,

सब वार चुकी,

कर-कर श्रृंगार

सँवार चुकी,

हरकर मुझको

तुम लेना जीत।

कुछ तो कहो,

मेरे मनमीत 

भली लगे न रीत!

उफ़्फ़्फ कैसी

तेरी प्रीत…!

सवितासिंह मीरा, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

3 thoughts on “कुछ तो कहो…

  1. बहुत कुछ कह जाती है चुप्पी जब संस्कार, लज्जा और माध्यम को भाषा छल जाए।
    तभी तो पत्र लिखना अनिवार्य हो गया ।
    चुप्पी अपनी अभिव्यक्ति के रास्ते खुद ही ढूंढ लेतीहै ।
    बहुत सुंदर कविता

  2. शब्दातीत रहे
    बिना कुछ कहे
    मौन गूजंन रहे
    नीभे मौन प्रीत
    भली लागे मीत
    तेरी सब रीत
    मन में बसे मीत
    तभी तो है प्रीत
    मानसदर्पण

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