मैं रोते-रोते हँस पड़ी चाँद लाने के लिए,
मैं सोते-सोते जग गई तुम्हें बताने के लिए।
पर आ सके न तुम अभी साथ देने के लिए।
मैं डाल-डाल झर गई तुम्हें बचाने के लिए,
इक वियोगिनी वियोग में तपस्विनी रही,
प्रतीक्षा-अरण्य में मैं डोलती सदा रही।
पर आ सके न तुम अभी साथ देने के लिए।
मैं बूँद-बूँद चू रही छत बचाने के लिए,
मैं पात-पात झर रही तुम्हें सजाने के लिए।
प्रणय के निलय में मैं सोचती सदा रही,
स्वप्न होगा पूर्ण कोई गीत गाने के लिए।
पर आ सके न तुम अभी साथ देने के लिए।
क्या है पूर्ण, क्या अपूर्ण—क्या करूँ मैं पता?
जो है प्राप्त, वही है पूर्ण मीत भाने के लिए।
एक सूर्य यूँ जला कि कल्पना ही जल गई,
कड़कड़ाती दामिनी में धुन कहीं खो गई।
पर आ सके न तुम अभी साथ देने के लिए।
सजी-धजी खड़ी रही, पा सकी न साज को,
मैं अनवरत चल पड़ी काँटों के वितान पर।
विमुख हुआ बसंत-फाग ही सदा के लिए,
बाज़ार की भीड़ को मैं चीरती चली गई।
पर आ सके न तुम अभी साथ देने के लिए।
बाग की बहार ही जब बिगड़ सी गई,
प्रीत क्या, मीत क्या, जग ही रूठने लगे।
टूटना ही भाग्य था तो नियति भी क्या करे,
साँझ से उधार ले एक किरण छुप गई,
भोर की रश्मियों की जब नज़र उधर पड़ी।
पर आ सके न तुम अभी साथ देने के लिए।

मंजुला श्रीवास्तव, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली
धन्यवाद
सटीक चित्र संलग्न करने हेतु।
विरह वेदना की मार्मिक अभिव्यक्ति लिए हुए उत्कृष्ट सार्थक, अनुपम गीत रचना..
शब्द विन्यास और छंद विधान में कतिपय संशोधन की आवश्यकता प्रतीत हो रही है..
श्रेष्ठ सृजन के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें 🙏💐💐
निर्मल 🙏
बहुत सुंदर और सटीक व्याख्या। जिसने भी
मेरे कविता की व्याख्या की है उसका हृदय से आभार ।
मृगतृष्णा के समान यह प्रतीक्षा
हृदय से निकलती एक वेदना जो घायल ही बाखूबी महसूस कर सकता है।
एक सुन्दर रचना
रचनाकार को बहुत बहुत बधाई
विरह वेदना की मार्मिक अभिव्यक्ति लिए हुए उत्कृष्ट सार्थक, अनुपम गीत रचना..
शब्द विन्यास और छंद विधान में कतिपय संशोधन की आवश्यकता प्रतीत हो रही है..
श्रेष्ठ सृजन के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें 🙏💐💐
निर्मल 🙏
Atti Sunder , bheetar tak hriday ko chhoti gayi saari panktiyaan.
Kabhi na kabhi kaheen na kaheen kissina kissike saath relate karti hain yeh panktiyaan aur waheen sabse badi uplabdi hoti hai kavi ki lekhni ki…..aur aapto mere liye sarvopariya ho.