ईश्वर से ऊँचा स्थान तुम्हारा, देते हो सबको सद्ज्ञान।
किसी तरह का भेद न करते, तुम पर हमको अभिमान।।
जो भी आया शरण तुम्हारी, उसको तुमने अपनाया।
जड़-मूरख मन में भी, तुमने ज्ञान का दीप जलाया।
सदा सिखाया बच्चों को करना आदर-सम्मान।
ईश्वर से ऊँचा स्थान तुम्हारा, देते हो सबको सद्ज्ञान।
किसी तरह का भेद न करते, तुम पर हमको अभिमान।।
स्नेहिल माँ-सा स्वभाव रहा, सत्य कहा जो भी कहा।
कभी छड़ी उठाई तो भी, मन में ममता का भाव रहा।
सच्ची राह दिखाते हो, तुम हो गुणों की खान।
ईश्वर से ऊँचा स्थान तुम्हारा, देते हो सबको सद्ज्ञान।
किसी तरह का भेद न करते, तुम पर हमको अभिमान।।
अन्न-धन तो पास सभी के, पास तुम्हारे विद्या-धन।
जिसके पास नहीं है विद्या, वह धनी भी है निर्धन।
सबसे बड़े दानी हो, तुम करते हो विद्यादान।
ईश्वर से ऊँचा स्थान तुम्हारा, देते हो सबको सद्ज्ञान।
किसी तरह का भेद न करते, तुम पर हमको अभिमान।।

डॉ. शशिकला पटेल, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
वाह वाहहहहहहह बहुत ही सुन्दर भाव लिए अनुपम रचना के लिए बधाई स्वीकारें आदरणीया 👏👏👏